उर्दू अदब की विशाल कहकशाँ (Cosmos) में, लखनऊ स्कूल की नज़ाकत और आधुनिक दौर की बेचैनी को अगर किसी शायर ने सबसे ख़ूबसूरती से पिरोया है, तो वो नाम है—ख़ुमार बाराबंकवी। उनकी शायरी में तरन्नुम भी है और एक मीठी सी टीस भी, जिसकी झलक हमने उनकी मशहूर ग़ज़ल "इक पल में इक सदी का मज़ा हमसे पूछिए" के विश्लेषण में देखी थी।
आज साहित्यशाला पर, हम उनकी एक और शाहकार रचना की गहराइयों में उतरेंगे: "न हारा है इश्क़ और न दुनिया थकी है।" यह ग़ज़ल सिर्फ़ मुहब्बत की दास्तान नहीं है; यह इन्सानी जज़्बे (Resilience), सामाजिक पतन और रूहानी अकेलेपन का आईना है। जिस तरह "मुझ को शिकस्त-ए-दिल" में एक टूटे हुए दिल की सदा गूँजती है, वैसे ही यहाँ ज़माने की सख़्तियों के ख़िलाफ़ इश्क़ का अदम्य साहस नज़र आता है।
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| क्लासिकल ग़ज़ल के एक अज़ीम फनकार: ख़ुमार बाराबंकवी |
ग़ज़ल (Lyrics)
न हारा है इश्क़ और न दुनिया थकी है
दिया जल रहा है हवा चल रही है
सुकूँ ही सुकूँ है ख़ुशी ही ख़ुशी है
तिरा ग़म सलामत मुझे क्या कमी है
खटक गुदगुदी का मज़ा दे रही है
जिसे इश्क़ कहते हैं शायद यही है
वो मौजूद हैं और उन की कमी है
मोहब्बत भी तन्हाई-ए-दाइमी है
चराग़ों के बदले मकाँ जल रहे हैं
नया है ज़माना नई रौशनी है
अरे ओ जफ़ाओं पे चुप रहने वालो
ख़मोशी जफ़ाओं की ताईद भी है
मिरे राहबर मुझ को गुमराह कर दे
सुना है कि मंज़िल क़रीब आ गई है
'ख़ुमार'-ए-बला-नोश तू और तौबा
तुझे ज़ाहिदों की नज़र लग गई है
शब्दार्थ (Farhang / Vocabulary)
शायरी का असल लुत्फ़ उठाने के लिए उसकी बारीकियों को समझना ज़रूरी है। ठीक वैसे ही जैसे मुक्तिबोध की चाँद का मुँह टेढ़ा है की बिम्बधर्मिता को समझना पड़ता है, वैसे ही ख़ुमार के इन अलफ़ाज़ को समझना ज़रूरी है:
| लफ़्ज़ (Word) | मायने (Meaning & Context) |
|---|---|
| तन्हाई-ए-दाइमी | शाश्वत अकेलापन (Eternal Solitude)। यह वही गहरा खालीपन है जिसका ज़िक्र इरफ़ान सत्तार की "मेरी आधी उम्र गुज़र गई" में मिलता है। |
| जफ़ाओं | जुल्म, सितम या बेवफ़ाई। |
| ताईद | समर्थन, हामी भरना या सहमति जताना। |
| बला-नोश | बहुत ज़्यादा पीने वाला (शराबी), यहाँ यह शब्द मस्ती और दुनिया से बेख़बरी के रूपक (Metaphor) के तौर पर इस्तेमाल हुआ है। |
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| "मोहब्बत भी तन्हाई-ए-दाइमी है" - रूहानी अकेलेपन की एक तस्वीर। |
विस्तृत विश्लेषण (Tashreeh & Analysis)
1. इश्क़ और ज़माने की कशमकश
न हारा है इश्क़ और न दुनिया थकी है
दिया जल रहा है हवा चल रही है
ग़ज़ल का आग़ाज़ एक ज़बरदस्त विरोधाभास (Contrast) से होता है। 'हवा' (दुनिया/मुसीबतें) 'दिए' (उम्मीद/इश्क़) को बुझाने पर आमादा है, लेकिन दिया भी अपनी ज़िद पर कायम है। यह शेर उम्मीद और जिजीविषा (Survival) की मिसाल है। ठीक वैसे ही जैसे नवाज़ देवबंदी कहते हैं: "सफ़र में मुश्किलें आएँ तो जुर्रत और बढ़ती है।"
2. मौजूदगी और कमी का फ़लसफ़ा
वो मौजूद हैं और उन की कमी है
मोहब्बत भी तन्हाई-ए-दाइमी है
यहाँ ख़ुमार साहब जिस्मानी दूरी से आगे निकलकर रूहानी प्यास की बात करते हैं। महबूब पास है, फिर भी एक खालीपन है। निदा फ़ाज़ली ने कहा था कि "कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता", और ख़ुमार उसे एक कदम और आगे ले जाते हैं—वह कहते हैं कि मोहब्बत असल में एक 'तन्हाई-ए-दाइमी' (Eternal Loneliness) है, जिसे कोई मिलन नहीं भर सकता।
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| नया ज़माना और नई रौशनी: "चराग़ों के बदले मकाँ जल रहे हैं" |
3. सामाजिक व्यंग्य (Social Satire)
चराग़ों के बदले मकाँ जल रहे हैं
नया है ज़माना नई रौशनी है
यह शेर आधुनिक तरक्की (Modern Progress) पर एक करारा तंज़ है। जहाँ पहले रौशनी के लिए दीये जलते थे, अब नफ़रत की आग में लोगों के आशियाने जल रहे हैं, और दुनिया इसे 'नई रौशनी' कहती है। यह विद्रोही तेवर हमें कैफ़ी आज़मी की नज़्मों की याद दिलाता है, जहाँ शायरी सिर्फ इश्क़ नहीं, बल्कि इंक़लाब भी बोलती है।
4. दर्द और लज़्ज़त (खटक और गुदगुदी)
खटक गुदगुदी का मज़ा दे रही है
जिसे इश्क़ कहते हैं शायद यही है
तकलीफ़ (खटक) का आनंद (गुदगुदी) में बदल जाना ही सच्चे इश्क़ की पहचान है। यह समर्पण का वो भाव है जो हमें "हाथों में हाथ रह जाए" जैसी रोमानी नज़्मों में महसूस होता है।
फ़न्नी जायज़ा (Technical Analysis)
उर्दू अदब के छात्रों (Students of Arooz) के लिए, इस ग़ज़ल की तकनीकी संरचना (Structure) इस प्रकार है:
- बहर (Meter): बहर-ए-मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम (Bahr-e-Mutaqarib Musamman Salim)
- अर्कान (Feet): फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन (1-2-2, 1-2-2, 1-2-2, 1-2-2)
- रदीफ़ (Radif): "है"
- क़ाफ़िया (Qaafiya): थकी, चली, कमी, यही, दाइमी, रौशनी (सभी में 'ई' स्वर की समानता है)।
अगर आप शायरी में "नज़र" और "खामोशी" के खेल को और गहराई से समझना चाहते हैं, तो अहमद फ़राज़ की ग़ज़ल "सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं" का विश्लेषण ज़रूर पढ़ें।
निष्कर्ष (Conclusion)
ख़ुमार बाराबंकवी की यह ग़ज़ल "न हारा है इश्क़" हमारे जीवन का एक आईना है—इसमें हमारे निजी दर्द भी हैं और समाज की कड़वी सच्चाइयाँ भी। यह हमें सिखाती है कि जब तक साँस है, तब तक आस है; और दिए का काम ही है हवा के ख़िलाफ़ जलते रहना।
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— साहित्यशाला संपादकीय टीम (Sahityashala Editorial Team)