भूमिका
हिंदी ग़ज़ल की दुनिया में कुछ शेर ऐसे होते हैं जो सीधे दिल में उतर जाते हैं। सोशल मीडिया पर अक्सर 'दुखती रग पर उंगली रखकर' जैसी पंक्तियाँ वायरल होती रहती हैं। हाल ही में इसे वरिष्ठ पत्रकार चित्रा त्रिपाठी के निजी जीवन और तलाक के संदर्भ में जोड़कर खूब साझा किया गया है। लेकिन, साहित्य के सच्चे प्रेमियों के लिए यह जानना आवश्यक है कि यह कालजयी रचना प्रसिद्ध कवयित्री दीप्ति मिश्र (Deepti Mishra) की है।
साहित्य में लेखक की सही पहचान भी पाठ का नैतिक हिस्सा है। इसीलिए आज साहित्यशाला के इस अंक में हम न केवल इस ग़ज़ल का सही पाठ प्रस्तुत कर रहे हैं, बल्कि इसके गहरे अर्थों की भी पड़ताल करेंगे। यह ग़ज़ल सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि एक प्रतिरोध है।
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| मैं अपने दोजख में ख़ुश हूँ, जन्नत चाहे जैसी हो... |
दुखती रग पर उंगली रखकर... (ग़ज़ल)
तुमसे ये उम्मीद नहीं थी, दुनिया चाहे जैसी हो.
अब तो जंग छिड़ेगी खुलकर, ऐसी हो या वैसी हो.
सूरज ने कब चाहा था, उसकी क़िस्मत ऐसी हो.
मैं तुमको भी ले डूबुंगी कश्ती चाहे जैसी हो.
मैं अपने दोजख में ख़ुश हूँ, जन्नत चाहे जैसी हो.
— दीप्ति मिश्र
ग़ज़ल का भावार्थ और विश्लेषण
दीप्ति मिश्र जी की यह ग़ज़ल सिर्फ़ शब्दों का जमावड़ा नहीं, बल्कि एक घायल मन का विद्रोह है। जब कोई अपना ही व्यक्ति, हमारी सबसे नाज़ुक पीड़ा (दुखती रग) को कुरेद कर औपचारिक हाल-चाल पूछता है, तो वह दर्द दोगुना हो जाता है। यह दर्द वैसा ही है जैसा खुमार बाराबंकवी की ग़ज़ल 'न हारा है इश्क़' में दिखता है, जहाँ प्रेम और वेदना का अद्भुत संगम है।
एकाकीपन और संघर्ष
शायरा लिखती हैं, "एक तरफ मैं बिल्कुल तन्हा..."। यह शेर उस स्थिति को दर्शाता है जब इंसान पूरी दुनिया के खिलाफ अकेला खड़ा होता है। जीवन के सफ़र में आने वाली इन मुश्किलों का जिक्र नवाज़ देवबंदी की ग़ज़ल 'सफ़र में मुश्किलें आएँ' में भी मिलता है, जो हमें चुनौतियों से लड़ने का हौसला देती है।
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| एक तरफ मैं बिल्कुल तन्हा, एक तरफ दुनिया सारी... |
नियति का स्वीकार
सूरज के उदाहरण से दीप्ति जी ने जीवन की विवशता को बयां किया है। जलना और चलना ही नियति है। इसी भाव को हरिवंश राय बच्चन जी ने अपनी कविता 'जो बीत गई सो बात गई' में सकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया है, कि जो हो गया उसे भूलकर आगे बढ़ना ही जीवन है।
जीवन में कई बार ऐसा लगता है कि हम सब कुछ हार गए हैं, जैसे 'दिल के बाज़ार' में सब कुछ लुटा दिया हो। इस अहसास को गहराई से समझने के लिए अनंत गुप्ता की रचना एक बेहतरीन उदाहरण है।
स्त्री-विमर्श और स्वाभिमान
अंतिम शेर में "मैं अपने दोजख में ख़ुश हूँ" कहकर शायरा ने दया और एहसान को ठुकरा दिया है। यह एक स्वाभिमानी स्त्री की आवाज़ है। ऐसी ही नारी सुलभ भावनाओं और प्रेम की गहराई को विद्यापति की रचना 'पिया मोर बालक' में भी देखा जा सकता है। साथ ही, अगर आप हिंदी भाषा की सुंदरता और क्लिष्टता में रुचि रखते हैं, तो हर्ष नाथ झा की 'संयुक्तक्षर' कविता ज़रूर पढ़ें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
क्या यह ग़ज़ल चित्रा त्रिपाठी ने लिखी है?
जी नहीं, यह सोशल मीडिया पर फैला एक झूठ है। यह ग़ज़ल दीप्ति मिश्र की रचना है। यह गलतफहमी इसलिए फैली क्योंकि कुछ सोशल मीडिया पेजों ने चित्रा त्रिपाठी की फोटो के साथ ये पंक्तियाँ शेयर की थीं।
'दुखती रग पर उंगली रखना' का क्या अर्थ है?
मुहावरे के तौर पर इसका अर्थ है किसी व्यक्ति की पुरानी पीड़ा, रहस्य या कमजोर कड़ी को जानबूझकर छेड़ना, जिससे उसे भावनात्मक या मानसिक कष्ट हो।
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निष्कर्ष
दीप्ति मिश्र की यह ग़ज़ल हमें सिखाती है कि स्वाभिमान से बढ़कर कोई जन्नत नहीं होती। चाहे दुनिया खिलाफ हो जाए, अगर आप अपनी शर्तों पर जी रहे हैं, तो वह 'दोजख' (नरक) भी स्वीकार्य है। सोशल मीडिया पर फैल रही भ्रामक जानकारियों से बचें और साहित्य की मूल आत्मा को पहचानें। अगर आप दीप्ति मिश्र की और रचनाएँ पढ़ना चाहते हैं, तो रेख़्ता पर उनका प्रोफाइल देख सकते हैं |