नमस्कार साहित्य प्रेमियों,
जीवन एक निरंतर यात्रा है जहाँ हम बहुत कुछ बनाते हैं, संजोते हैं, और अंततः उसे पीछे छोड़कर आगे बढ़ जाते हैं। सृजन का आनंद अद्भुत होता है, लेकिन उस सृजन से बिछड़ने का दर्द उतना ही गहरा होता है। आज साहित्यशाला के इस मंच पर हम आपके लिए लेकर आए हैं योगेंद्र त्रिपाठी जी की एक बेहद भावुक और दार्शनिक रचना।
यह कविता एक मूर्तिकार और एक गृहस्थ के माध्यम से जीवन की सबसे बड़ी विडंबना को उजागर करती है—कि रचयिता को अपनी ही रचना से विदा लेनी पड़ती है। जिस तरह इश्क में हार कर भी एक खुमार बाकी रहता है, ठीक वैसे ही सृजन के विरह में भी एक मीठा सा दर्द छिपा होता है। आइए, इस मर्मस्पर्शी कविता के माध्यम से जीवन के इस गूढ़ सत्य को महसूस करें।
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| सृजन के क्षणिक सुख और विरह के स्थायी दर्द को दर्शाता एक कलात्मक चित्रण। |
|| सृजन और विरह ||
तिनके-तिनके जोड़ कर घर बनाना,
फिर जीवन की राह में आगे बढ़ते हुए
उसी घर को अलविदा कहना–
ठीक उसी प्रकार जैसे मूर्तिकार
एक रूप गढ़ता है,
पत्थर में साँसें भरता है,
हर चोट के साथ अपनी पीड़ा,
हर रेखा में अपना स्वप्न उतार देता है,
और जब प्रतिमा बोलने-सी लगती है,
जब उसमें उसकी आत्मा झलकने लगती है,
तब वही कृति
दो पैसे के मोल
किसी और के आँगन सौंप देता है।
घर हो या प्रतिमा,
सृजन का सुख क्षणिक होता है,
विरह स्थायी–
क्योंकि रचने वाले का भाग्य यही है
कि वह अपने ही बनाए संसार से
चुपचाप विदा ले,
और आगे बढ़ जाए
एक और अधूरे स्वप्न को
पूरा करने की आस में।
भावार्थ और जीवन दर्शन
कवि कहते हैं कि रचने वाले का भाग्य ही विदा लेना है। हम अक्सर देखते हैं कि सफर में मुश्किलें आती हैं, लेकिन मुसाफिर रुकता नहीं है। मूर्तिकार अपनी मूर्ति में अपनी 'साँसें' और 'पीड़ा' भर देता है, ठीक वैसे ही जैसे रवींद्रनाथ टैगोर अपनी गीतांजलि में ईश्वर और रचना के गहरे संबंध को दर्शाते हैं। यदि आप योगेंद्र त्रिपाठी की अन्य रचनाएँ पढ़ेंगे, तो पाएंगे कि उनकी लेखनी में जीवन के ऐसे ही गूढ़ सत्य छिपे होते हैं।
यह कविता हमें सिखाती है कि मोह (Attachment) ही दुख का कारण है, लेकिन कर्म (Creation) करना हमारा धर्म है। कभी-कभी लगता है कि हाथों में हाथ रह जाए और हम उस पल को रोक लें, परन्तु समय और नियति हमें आगे बढ़ा देते हैं।
जीवन के इस कुरुक्षेत्र में हर रचयिता एक योद्धा है। जिस तरह राणा के वंशज हार नहीं मानते, उसी तरह एक कलाकार अपनी कृति को सौंपकर एक 'अधूरे स्वप्न' को पूरा करने फिर निकल पड़ता है। यही जीवन की प्रेरणा है। अंततः, चाहे सुख हो या दुख, सब कुछ यहीं रह जाता है क्योंकि सबके लेखे सदा सुलभ होते हैं, और कर्म का फल ही सत्य है।
प्रिय पाठकों,
योगेंद्र त्रिपाठी जी की यह कविता आपको कैसी लगी? क्या आपने भी कभी कुछ शिद्दत से बनाया और फिर उसे अलविदा कहा? अपने अनुभव हमारे साथ कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें। ऐसी ही मर्मस्पर्शी और बेहतरीन रचनाओं के लिए साहित्यशाला के साथ जुड़े रहें।
"सृजन का सुख क्षणिक है, पर उसका प्रभाव अनंत है..."
