मनुष्य का स्वभाव कितना विचित्र है? हम उसी डाली को काटते हैं जिस पर हम बैठे होते हैं, और विडंबना देखिए—थक जाने पर हम उसी वृक्ष की छांव में सुस्ताने भी लगते हैं जिसे हम जड़ से खत्म कर रहे हैं। साहित्यशाला (Sahityashala) पर आज हम आपके लिए एक ऐसी ही मर्मस्पर्शी रचना (Heart-touching Hindi Poem) लेकर आए हैं, जो सिर्फ कविता नहीं, बल्कि प्रकृति की एक मूक चीख है।
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| "जलती धूप में खुद भी पसीना पसीना हो गया..." — The irony of cutting down the very shade we need. |
जिस तरह प्रकृति की क्रूरता और कोमलता के बीच एक बारीक रेखा होती है, ठीक वैसे ही इंसान की जरूरतों और लालच के बीच भी एक धुंधली लकीर है। यह कविता हमें आईना दिखाती है कि कैसे हमने 'धरा के रक्षक' को धराशायी कर दिया है।
उसकी ही छांव तले आराम करने लगे
उसकी ही छांव तले आराम करने लगे
जिसे काटते- काटते थक गए थे, बेपीर
बेशर्मी की इन्तेहाँ से, वाकिफ जो न थे
न कुल्हाड़ी रूकी, न ही फलों का गिरना
फिर एक आखिरी प्रहार भी कर दिया
और धराशायी हो गया धरा का रक्षक
बेजुबां, शायद कुछ कहना चाह रहा था
पर क्यूं स्वार्थी कानों तक बात न पहुंची
टुकड़े टुकड़े कर दिए हर एक शाख के उसने
जलती धूप में खुद भी पसीना पसीना हो गया
शाख के हर एक टुकड़े की अहमियत थी, कि
चूल्हे धरी कढ़ाई को भी आग का इंतजार था
वो अब, हमसे शायद ही कुछ उम्मीद रखते हों
पर हम तो उनके बिना निश्चित ही नाउम्मीद है
क्यों न हम सब मिलकर
अब उसको न्याय दिलाए
हर एक चोट के बदले उसकी
हम सौ - सौ वृक्ष लगाएं
कविता का भावार्थ और सामाजिक संदेश (Analysis)
यह कविता आधुनिक मानव की 'बेशर्मी' और 'स्वार्थ' पर करारा प्रहार है। कवि ने उस विरोधाभास (Irony) को बहुत खूबसूरती से उभारा है जहाँ लकड़हारा पेड़ काटते हुए जब थक जाता है, तो उसी पेड़ की छांव मांगता है। यह स्थिति हमें भाई राहगीर के गीत 'ये हम कौनसी गाड़ी पे चढ़ गए' की याद दिलाती है, जहाँ हम विकास की अंधी दौड़ में विनाश की ओर बढ़ रहे हैं।
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| Sachin Tiwari (Author) — A voice for the unspoken and a sensitive contemporary Hindi writer. |
लेखक परिचय: सचिन तिवारी (Sachin Tiwari) इंदौर, मध्य प्रदेश के एक संवेदनशील समकालीन हिंदी कवि और कहानीकार हैं। वे जेल विभाग में कार्यरत हैं और उनकी एक चर्चित पुस्तक 'पिंजरे का परिंदा' भी प्रकाशित हो चुकी है।
1. बेजुबां का दर्द (The Silent Cry)
पंक्तियाँ "बेजुबां, शायद कुछ कहना चाह रहा था" पाठक को झकझोर देती हैं। पेड़ों का कटना सिर्फ लकड़ी का गिरना नहीं है, बल्कि एक जीवन का अंत है। हिंदी साहित्य में माखनलाल चतुर्वेदी ने भी पुष्प की अभिलाषा के माध्यम से फूल की भावनाओं को व्यक्त किया था, लेकिन यहाँ संदर्भ बलिदान का नहीं, बल्कि हत्या का है।
2. आवश्यकता बनाम लालच (Need vs Greed)
कवि ने चूल्हे और कढ़ाई का ज़िक्र करके यह भी माना है कि लकड़ी मनुष्य की आवश्यकता है ("चूल्हे धरी कढ़ाई को भी आग का इंतजार था")। लेकिन समस्या उपयोग में नहीं, बल्कि शोषण में है। हमें धरती, ममता और मनुष्य के बीच मध्यम मार्ग खोजने की जरूरत है। हम प्रकृति से लें, लेकिन उसे वापस देना भी सीखें।
3. प्रायश्चित का मार्ग: वृक्षारोपण (The Solution)
कविता का अंत निराशा में नहीं, बल्कि संकल्प में होता है—"हम सौ-सौ वृक्ष लगाएं"। सुभद्रा कुमारी चौहान की कदंब का पेड़ कविता हमें बचपन और प्रकृति के खेल की याद दिलाती है, और यह कविता हमें उस खेल के मैदान को बचाने की जिम्मेदारी सौंपती है।
मौसम बदल रहा है, कभी बेतहाशा गर्मी तो कभी बेमौसम बारिश। यह परिवर्तन चेतावनी है कि अगर हमने आज पेड़ नहीं लगाए, तो कल छांव नसीब नहीं होगी।
निष्कर्ष (Conclusion)
यह कविता मात्र शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि एक 'अलार्म' है। प्रकृति (Nature) हमारी पूर्वज भी है और वारिस भी। अगर आप भी प्रकृति प्रेमी हैं, तो प्रकृति पर हमारी अन्य कविताओं का संग्रह जरूर पढ़ें और इस मुहिम का हिस्सा बनें। याद रखें, एक पेड़ का कटना सिर्फ एक तने का गिरना नहीं, बल्कि एक पूरी सभ्यता की ऑक्सीजन का कम होना है।
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Frequently Asked Questions (FAQs)
Q: 'उसकी ही छांव तले आराम करने लगे' कविता का मुख्य संदेश क्या है?
Ans: इस कविता का मुख्य संदेश मनुष्य की स्वार्थपरता को उजागर करना और पर्यावरण संरक्षण (Environment Conservation) के लिए जागरूक करना है। कवि हर काटे गए पेड़ के बदले 100 नए पेड़ लगाने का आह्वान करते हैं।
Q: पेड़ हमारे लिए क्यों महत्वपूर्ण हैं? (Why are trees important?)
Ans: पेड़ हमें प्राणवायु (Oxygen) देते हैं, तापमान नियंत्रित करते हैं, और मिट्टी के कटाव को रोकते हैं। कविता में उन्हें 'धरा का रक्षक' कहा गया है क्योंकि वे पृथ्वी के अस्तित्व के लिए अनिवार्य हैं।
Q: मैं पर्यावरण बचाने में कैसे योगदान दे सकता हूँ?
Ans: आप अपने जन्मदिन या विशेष अवसरों पर वृक्षारोपण करके, कागज की बचत करके, और लोगों को 'Save Trees' मुहिम के प्रति जागरूक करके अपना योगदान दे सकते हैं।

