भारतीय संस्कृति में वसंत को 'ऋतुराज' यानी ऋतुओं का राजा कहा जाता है। यह केवल मौसम का बदलाव नहीं, बल्कि प्रकृति और मन के पुनर्जन्म का उत्सव है। जब पीली सरसों लहलहाती है और माँ वाग्देवी (Saraswati) की वीणा झंकृत होती है, तो लगता है जैसे पूरा संसार संगीत में डूब गया है।
![]() |
| "वाग्देवी वीणा मधुर बजाएँ..." — A celebration of nature and wisdom on Basant Panchami. |
आगामी बसंत पंचमी (Basant Panchami) के पावन अवसर पर, साहित्यशाला (Sahityashala) आपके लिए लाया है इंदौर की युवा कवयित्री अपूर्वा चौधरी (Apurva Choudhary) की एक ताज़ा और मनमोहक रचना—"मानो जैसे वसंत आए"। यह कविता ठीक वैसे ही मन को शीतल करती है जैसे चेतना पारीक की कविताओं में भावनाओं की कोमलता होती है।
मानो जैसे वसंत आए
ठिठुरी धाराएँ जब मुस्काएँ,
वाग्देवी वीणा मधुर बजाएँ।
ज्ञान के मोती झर-झर झलकाएँ,
मानो जैसे वसंत आए।
सूनी डालों में पत्ते छाएँ,
पीली चुनर ओढ़े सरसों लहराएँ।
धूप की सुनहरी आहट
हर कोने को रोशन कर जाए,
मानो जैसे वसंत आए।
पंछी मधुर गीत सुनाएँ,
तितलियाँ रंगों में झूम जाएँ।
नव कोपल मन को शीतल कर जाए,
नीरसता की लंबी रात
उत्साह में घुल जाए—
मानो जैसे वसंत आए।
Student & Writer (Indore)
Published via Sahityashala.in
कविता का भावार्थ और वसंत का सौंदर्य (Analysis)
अपूर्वा जी की यह कविता वसंत के आगमन के साथ-साथ ज्ञान की देवी माँ सरस्वती की आराधना भी है। कविता की शुरुआत "वाग्देवी वीणा मधुर बजाएँ" से होती है, जो बसंत पंचमी के महत्व को रेखांकित करती है। साहित्य में छंद और लय का ज्ञान रखने वाले पाठक जानते हैं कि पिंगल शास्त्र और ग़ज़ल की संरचना की तरह ही मुक्त छंद में भी एक आंतरिक लय (Rhythm) का होना कितना आवश्यक है, जो इस कविता में बखूबी दिखता है।
1. प्रकृति का श्रृंगार (Nature's Adornment)
कवयित्री ने "पीली चुनर ओढ़े सरसों" का जो बिंब (Imagery) प्रयोग किया है, वह भारतीय गाँवों की आत्मा है। जब प्रकृति अपना पुराना आवरण त्यागती है, तो वह ठीक वैसी ही नई और ताज़ा लगती है जैसे अभी ये दौलत नई-नई है गज़ल में नएपन का एहसास होता है। सूनी डालों पर पत्तों का आना जीवन में उम्मीद की वापसी का प्रतीक है।
2. नीरसता से उत्साह की ओर (From Despair to Hope)
कविता की अंतिम पंक्तियाँ "नीरसता की लंबी रात, उत्साह में घुल जाए" बहुत महत्वपूर्ण हैं। सर्दी (Winter) अक्सर ठहराव और उदासी का प्रतीक होती है, जबकि वसंत गति और उत्सव का।
यह भाव हमें सोनल यादव की उस कविता की याद दिलाता है जहाँ छात्र जीवन की चुनौतियों की बात की गई थी (क्या हम फिर वैसे ही लौट पाएंगे?)। जिस तरह एक छात्र घर से दूर होकर भी सपनों के लिए लड़ता है, उसी तरह पतझड़ के बाद प्रकृति भी फिर से खिल उठती है।
लेखिका परिचय: अपूर्वा चौधरी इंदौर (मध्य प्रदेश) की एक छात्रा हैं। साहित्य और लेखन के प्रति उनका गहरा लगाव है। वे मानती हैं कि शब्द ही भावों को जीवित रखने का सबसे सशक्त माध्यम हैं। यह उनकी साहित्यशाला पर पहली प्रस्तुति है।
उत्सव और साहित्य का संगम
चाहे वह गणतंत्र दिवस की देशभक्ति हो, राम के प्रति भक्ति भाव हो, या फिर वसंत का उल्लास—हिंदी कविता हर रंग में ढल जाती है। अपूर्वा की यह कविता हमें याद दिलाती है कि इश्क और प्रकृति कभी हारते नहीं, वे बस रूप बदलते हैं।
✍️ क्या आप भी लिखते हैं?
अपूर्वा की तरह आप भी अपनी रचनाएँ साहित्यशाला पर प्रकाशित कर सकते हैं।
Publish With Us (Guest Post Guidelines)
For brand collaborations: Advertise With Us | Sahityashala Media Kit
Frequently Asked Questions (FAQs)
Q: 'मानो जैसे वसंत आए' कविता किसकी रचना है?
Ans: यह कविता इंदौर की युवा कवयित्री और छात्रा, अपूर्वा चौधरी (Apurva Choudhary) द्वारा रचित है।
Q: इस कविता का मुख्य विषय क्या है?
Ans: यह कविता वसंत ऋतु (Spring Season) के आगमन, प्रकृति के सौंदर्य (सरसों, नई कोपलें) और माँ सरस्वती (वाग्देवी) की वंदना पर आधारित है।
Q: साहित्यशाला पर अपनी कविता कैसे भेजें?
Ans: आप हमारी वेबसाइट के 'Publish With Us' पेज पर जाकर दिशा-निर्देश पढ़ सकते हैं और अपनी रचना सबमिट कर सकते हैं।
