Kya Hum Phir Waise Hi Laut Payenge? – Sonal Yadav | Emotional Hindi Poem on Student Life & Leaving Home
हर साल हज़ारों छात्र अपनी आँखों में सुनहरे भविष्य के सपने सजाकर उस घर की चौखट लांघते हैं, जिसने उन्हें पाल-पोस कर बड़ा किया। हम सूटकेस में कपड़े तो भर लेते हैं, लेकिन वो सुकून वहीं कहीं छूट जाता है। दिल्ली विश्वविद्यालय (Delhi University) की छात्रा सोनल यादव (Sonal Yadav) की यह नई रचना, "क्या हम फिर वैसे ही लौट पाएँगे?", महज़ शब्दों का खेल नहीं, बल्कि हर उस प्रवासी छात्र (Migrant Student) का आईना है जो घर से दूर एक अनजान शहर में अपनी पहचान तलाश रहा है।
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| "जब घर छोड़ा था उन सपनों के लिए..." — The silent struggle of leaving home for a better future. |
जिस तरह जीवन में हम अक्सर उलझन से उम्मीद तक का सफ़र तय करते हैं, उसी तरह घर छोड़ने का फैसला भी हमें असमंजस में डाल देता है। क्या सफलता की कीमत अपने घर से अजनबी हो जाना है? आइये पढ़ते हैं यह मर्मस्पर्शी कविता और टटोलते हैं उन ज़ख्मो को जो वक्त के साथ भरते नहीं, बस गहरे होते जाते हैं।
क्या हम फिर वैसे ही लौट पाएँगे?
कि एक दिन कुछ सपनों के लिए
अपने उस घर को छोड़ आए,
जिसने हमें सब कुछ दिया।
जब घर छोड़ा था उन सपनों के लिए,
ये सोचा ही नहीं
कि क्या जैसे हैं, वैसे लौट पाएँगे।
जब घर आएँगे,
तो क्या हम वही रह पाएँगे?
अब जब घर जाते हैं,
तो जाते ही पूछा जाता है—
“कितने दिन के लिए आए हो?”
क्या हम इसका जवाब दे पाते हैं?
घर जाते ही
बाहर की चिंताएँ
क्या हम भूल पाते हैं?
क्या उस घर में
हम फिर वैसे ही लौट पाएँगे?
क्या माँ को देखते ही
गले लगकर
अपनी सारी परेशानियाँ बता पाता हूँ?
क्या उस घर
हम फिर लौट पाएँगे…
Published via Sahityashala.in
कविता का मर्म: घर, यादें और बदलती पहचान (In-Depth Analysis)
सोनल जी की यह कविता बहुत ही सरल शब्दों में एक बहुत गहरी बात कह जाती है। साहित्य में अक्सर सृजन का सुख और विरह का दर्द एक साथ चलता है। जब एक छात्र घर से निकलता है, तो वह अपने भविष्य का 'सृजन' (Creation) तो कर रहा होता है, लेकिन साथ ही अपने अतीत से 'विरह' (Separation) भी भोग रहा होता है।
1. मेहमान बनने की पीड़ा (The Pain of Being a Guest)
कवयित्री पूछती हैं—"कितने दिन के लिए आए हो?"। यह प्रश्न सीधा दुखती रग पर उंगली रखने जैसा है। वह घर, जहाँ कभी हम हक से रहते थे, वहां अब हमारा आगमन 'दिनों की गिनती' में सिमट जाता है। यह अहसास कि आप अपने ही घर में एक 'विजिटर' बन गए हैं, मानसिक रूप से तोड़ देता है।
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2. माँ से छिपाई गई बातें (Unspoken Emotions)
कविता की अंतिम पंक्तियाँ माँ के साथ बदलते समीकरण को दर्शाती हैं। बचपन में माँ से कुछ नहीं छिपता था, लेकिन बड़े होने पर हम अपनी परेशानियों को छिपाना सीख जाते हैं। यह स्थिति ठीक वैसी ही बेबसी लाती है जैसी नज़ीर अकबराबादी की गज़लों में प्रेम और पीड़ा की मिली-जुली कैफियत होती है—जहाँ जान निकलती भी है और बनी भी रहती है। हम माँ को परेशान नहीं करना चाहते, इसलिए हम घर लौटकर भी 'पूरी तरह' नहीं लौटते।
3. वैश्विक साहित्य में 'घर' की तड़प
यह पीड़ा सिर्फ भारतीय छात्रों की नहीं है। अगर हम अंग्रेजी साहित्य की ओर देखें, तो John Keats की रचना Ode to a Nightingale भी इसी तरह के पलायन और दर्द (Escapism and Pain) की बात करती है, जहाँ कवि वास्तविकता से दूर जाना चाहता है। लेकिन सोनल की कविता में 'भागने' की नहीं, बल्कि 'लौटने' की एक असफल कोशिश दिखाई देती है।
हिंदी कविता के तकनीकी पक्ष को समझने वाले छात्र जानते हैं कि इस कविता में मुक्त छंद (Free Verse) का प्रयोग है, जो आधुनिक संवेदनाओं के लिए सबसे उपयुक्त है। (हिंदी काव्य के रस, छंद और इतिहास को गहराई से समझने के लिए आप हमारी विस्तृत गाइड पढ़ सकते हैं)।
एक विरोधाभास: जहाँ यह कविता कोमल भावनाओं और मौन आंसुओं की बात करती है, वहीं जीवन में कई बार हमें संघर्ष के लिए कठोर होना पड़ता है, ठीक वैसे ही जैसे रामधारी सिंह दिनकर की 'परशुराम की प्रतीक्षा' में पौरुष और हुंकार है। एक छात्र का जीवन इन दोनों ध्रुवों के बीच झूलता है—कभी माँ की गोद की कोमलता, तो कभी दुनिया से लड़ने की कठोरता।
निष्कर्ष (Conclusion)
सोनल यादव की यह कविता आज की पीढ़ी की आवाज़ है। यह उस दौर की कविता है जहाँ अभी मुंडे (Psycho Shayar) जैसे युवा कवि अपनी नई शैली में जज़्बातों को पिरो रहे हैं। हम घर से दूर तो आ गए हैं, और शायद हम फिर कभी 'वैसे' नहीं लौट पाएंगे, लेकिन इन कविताओं के ज़रिए हम उस घर को अपने दिल में ज़िंदा रख सकते हैं।
साहित्यशाला परिवार सोनल यादव को उनके उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएँ देता है।
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Frequently Asked Questions (FAQs)
Q: 'क्या हम फिर वैसे ही लौट पाएँगे?' कविता का मुख्य भाव क्या है?
Ans: इस कविता का मुख्य भाव 'विस्थापन की पीड़ा' (Pain of Displacement) और घर से दूर रहने वाले छात्रों की मानसिक स्थिति है। यह उस बदलाव को दर्शाती है जो घर छोड़ने के बाद हमारे व्यक्तित्व में आता है।
Q: सोनल यादव कौन हैं?
Ans: सोनल यादव दिल्ली विश्वविद्यालय (Delhi University) की एक छात्रा और उभरती हुई कवयित्री हैं, जो छात्र जीवन और भावनात्मक विषयों पर लिखती हैं।
Q: मैं अपनी कविता Sahityashala.in पर कैसे प्रकाशित कर सकता हूँ?
Ans: आप हमारी वेबसाइट के 'Publish With Us' पेज पर जाकर अपनी रचना भेज सकते हैं। हम हिंदी, अंग्रेजी और मैथिली साहित्य को बढ़ावा देते हैं।

