हिंदी साहित्य के विस्तृत गगन में, कविताएँ अक्सर हमारे अंतर्मन के द्वंद्व का दर्पण होती हैं। आज साहित्यशाला को आगरा की उभरती हुई लेखिका अनुपमा आर्य की एक अत्यंत मर्मस्पर्शी रचना प्रस्तुत करते हुए गर्व है। उनकी यह कविता, जिसका शीर्षक है—"उलझन से उम्मीद तक", आत्म-संदेह (self-doubt) के तूफानों, तुलना के दबाव और अंततः संकल्प की शक्ति की यात्रा है।
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| A visual representation of the poem's central conflict: standing at life's crossroads, weighed down by the fear of failure while gazing at the distant possibility of success. |
अनुपमा जी के शब्द उन सभी से संवाद करते हैं जो कभी न कभी जीवन के दोराहे पर खड़े होकर अपनी क्षमताओं पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं। जिस प्रकार हर्ष नाथ झा की कविताओं में एक गहरी उदासी और चिंतन झलकता है, ठीक उसी तरह अनुपमा भी अपने भीतर के अंधेरे को टटोलती हैं, लेकिन अंत में उजाले की ओर कदम बढ़ाती हैं। उनकी पंक्तियाँ हमें याद दिलाती हैं कि सफलता का मार्ग सीधा नहीं, बल्कि भय और महत्वाकांक्षा के बीच की एक 'रस्साकशी' है।
उलझन से उम्मीद तक
बदल के देखी अपनी राहें, जतन भी मैंने लाख किए,
मुड़ गई उस डगर पे आखिर, जो ख़्वाब थे मैंने बुन लिए।
मगर न पता था राहों में, इतनी तकलीफें आएँगी,
या मेरी अपनी ही उलझनें, मेरा रास्ता रुकवाएँगी।
कभी खुद को देखूँ, कभी औरों को, फिर खुद को ही समझाती हूँ,
इस रस्साकशी की कोशिश में, मैं अक्सर पीछे रह जाती हूँ।
वो जो शिखर पर बैठे हैं, क्या कभी वो भी उलझे थे?
क्या मेरी तरह ही रास्तों में, वो भी कभी भटके थे?
गैरों की चमक को देख कर, क्यों खुद को कम मैं मानती?
क्यों उनके मन की सोच से, मैं अपनी रूह को छानती?
क्या खुद पर ऐतबार नहीं, क्यों शंकाओं में घिरी हूँ मैं?
क्यों रुकती हूँ हर कदम पर, क्यों डर-डर के चली हूँ मैं?
खौफ यही है मन में बस, कि परिणाम अगर न मिला तो क्या?
अगर हार ही मुकद्दर हुई, और हाथ कुछ न लगा तो क्या?
क्या फिर से शून्य पे खड़ा होकर, आरंभ दोबारा करना होगा?
क्या बार-बार इस प्रक्रिया में, हिम्मत से हाथ धोना होगा?
क्यों मैं अपनी ही राह पर, निर्भय होकर चल नहीं सकती?
क्यों अपने कहे और फैसलों पर, मैं अटल रह नहीं सकती?
गर परिणाम विपरीत हुए, तो क्या मैं फिर न उठूँगी?
क्या फिर से कोशिश करने की, मैं सामर्थ्य नहीं रखूँगी?
संपादकीय दृष्टिकोण: एक सार्वभौमिक संघर्ष
अनुपमा जी का यह प्रश्न—"क्या फिर से शून्य पे खड़ा होकर, आरंभ दोबारा करना होगा?"—पुनः शुरुआत करने के उस डर को उजागर करता है जो हम सभी के भीतर कहीं न कहीं छिपा है। यह भावना रश्मि सिंह की क्रांतिकारी कविताओं के स्वर से मेल खाती है, जहाँ मन का मौसम उदासी से शक्ति में बदलता है।
कविता में 'शिखर' और 'राहों' का जिक्र हमें प्रकृति और मनुष्य के बीच के उस मध्यम मार्ग और संतुलन की याद दिलाता है। जहाँ एक ओर इंदुजी जैसी रचनाएँ व्यंग्य का सहारा लेती हैं, वहीं अनुपमा आत्म-मंथन (introspection) को चुनती हैं। उनकी पंक्तियाँ हमें बाहरी दुनिया के शोर से हटकर अपने भीतर झांकने के लिए प्रेरित करती हैं, जैसा कि हम 'अमौसा के मेला' जैसी लोक कथाओं में पाते हैं।
चाहे आप योगेंद्र त्रिपाठी के सृजन और विरह के छंद पढ़ रहे हों या 'एक शिकार इतने शिकारी' जैसी आधुनिक रचनाएँ, मूल भावना एक ही है—मानवीय जिजीविषा। जैसे हम गणतंत्र दिवस की कविताओं में राष्ट्र के गौरव का उत्सव मनाते हैं, वैसे ही अनुपमा जैसी लेखिकाओं की व्यक्तिगत आवाज़ हमारे साहित्य के भविष्य को परिभाषित करती है।
निष्कर्ष
अनुपमा आर्य की "उलझन से उम्मीद तक" केवल एक कविता नहीं, बल्कि हर स्वप्नदर्शी का एक एकालाप (monologue) है। यह पाठकों को चुनौती देती है कि वे असफलता को अंत नहीं, बल्कि एक सीढ़ी मानें। हमें आशा है कि यह रचना आपको अपनी राह पर निडर होकर चलने की प्रेरणा देगी।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
'उलझन से उम्मीद तक' कविता की लेखिका कौन हैं?
अनुपमा आर्य की कविताओं का मुख्य विषय क्या है?
मैं साहित्यशाला पर अपनी कविताएँ कैसे प्रकाशित कर सकता हूँ?
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