साहित्य केवल शब्दों का खेल नहीं है, बल्कि यह वह आईना है जिसमें समाज अपना अक्स देखता है। नई पीढ़ी की कलम जब कागज़ पर उतरती है, तो वह केवल प्रेम नहीं लिखती, बल्कि व्यवस्था पर सवाल भी उठाती है और मन की गहरी उदासी को भी शब्द देती है।
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| "मगर बस एक उदासी है जो जरा देर रहती है" — Capturing the solitude behind the verses. |
आज साहित्यशाला के इस मंच पर हम स्वागत कर रहे हैं दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा और उभरती हुई कवयित्री रश्मि सिंह का। रश्मि की लेखनी में एक तरफ प्रकृति का सौंदर्य है, तो दूसरी तरफ दुष्यंत कुमार जैसी सामाजिक चेतना की चिंगारी भी। आइए, उनकी इन तीन विशेष रचनाओं के माध्यम से भावनाओं के इस सफर को तय करते हैं।
1. उदासी ज़रा देर रहती है
जीवन में सुख क्षणभंगुर है, जैसे नदी की लहरें जो आती हैं और चली जाती हैं। रश्मि की यह पहली कविता उस 'उदासी' का मानवीकरण करती है जो जाने का नाम नहीं लेती। यह कविता हमें महादेवी वर्मा की वेदना की हल्की सी झलक देती है।
ये सोच कर में सोच में रहती हूँ हर दफा,
ज़िंदगी की नाव अब किस ओर बहती है.
खुशी तो चंद मिनटों की अदायें लेके आई थी,
मगर बस एक उदासी है जो जरा देर रहती है।।
क्या समझा, क्या जाना है
मैने सुरमे की रंगत को
मेरे अंदर की एक बहरी मुझे हर बार कहती है,
फरेबी जाल हैं सारे जो बैठे खौफ खाएं हैं,
मगर बस एक उदासी है जो जरा देर रहती है।।
ज़माने भर की मीठी, कागज़ी हैं स्वांग हसरतें,
जो एक उमड़ी नदी के भाँति मेरे जी में बहती हैं,
यकीनं भिन्नता है इस उमड़ में छल फरेबी की,
मगर बस एक उदासी है जो जरा देर रहती है।।
(सन्दर्भ: जैसे उस तट पर प्यास बुझाने की विडंबना होती है, वैसे ही यहाँ खुशियों की प्यास और उदासी का सागर है।)
2. क्रांतिकारी
क्या क्रांति केवल युद्ध के मैदान में होती है? या वह उस फुटपाथ पर भी लड़ी जा रही है जहाँ एक व्यक्ति 'रोटी' के लिए अपनी तकदीर से जूझ रहा है? यह कविता एक महाभारत सरीखे व्यक्तिगत संघर्ष का चित्रण है।
थर थराती ठंड में जो चादरों की ओढ़ कर
सो रहा फुटपाथ पर वो देह को सिकोड़ कर,
था निडर वो बंधनों से हर एक तदबीर के,
पर था गुलाम बंधनों का अपनी ही तक़दीर के।
क्या लिखें थी बेबसी
जो खोज जिंदगी क्षण में हो
जो भाँति क्रांतिकारी के
रोटी के लिए रण में हो
सिसकता रोता काँपता वो और सिकुडे जाता था,
फुटपाथ को लाचारी से वो और भी सजाता था,
रूप भी अब सूख कर खाली दिखाई पड़ता था,
हर रोज झेंप झेंप कर रोटी के लिए लड़ता था।
तेहरीर भी तो क्या लिखे
जब थी खुद बेबस बंदगी!!
यकीनन लिख भी दे तो क्या हुआ
जब दोषी ही है जिंदगी।
उत्तेजित हो उठने की प्रेरणा लेकर बांण उठाया है
इस देश के हर एक बंदे ने अपना एक धर्म निभाया है
सम्यक् वी क्रांतिकारी था,
जो खुद ही खुद की ढाल था,
पेचिदगी हर ओर से
पर वो बड़ा उबाल था,
अक्सर मिला करती हूँ जब पूछती हूँ एक सवाल,
रणविजय तो हो गया.... पर है कहाँ तेरी मिशाल
भयभीत हुआ करता है, सुनकर वो पेचीदा बहस !!
सच कहूँ तो ढूढ़ती मैं खुद ये बातों के रहस्य??
संग्राम तो हुए बहुत.. अनगिनत प्रचार थे, मायने रखता है की, कितने ही नवाचार थे।
रोटी को तो तू लड़ लिया, कैसे लड़ेगा प्रारब्ध से?
याकीनन है बड़ा बाग़ी रे तू !!! पर क्या करे कृतबद्ध से!?
हर रोज़ आऊँगी यहीं तुझसे हकीकत पूछने हर बार पूछेंगी यही क्या है गनीमत सोच में लेकिन क्या महज़ दुलारी से
झुलसा अंगारा नर्म हुआ
या क्रांति थल का शीत पृष्ठभू रोजाना से गर्म हुआ
अनगिनत मेरे सवाल.. बने हुए संग्राम हैं,
पेचिदा तो हैं मगर
"पर क्या ये भी अविराम है।।?"
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| "थर थराती ठंड में... सो रहा फुटपाथ पर" — The harsh reality of survival depicted in the poem Krantikari. |
जीवन के इस संग्राम में, हर व्यक्ति को हर दिन थोड़ा सीखना और लड़ना पड़ता है।
3. आज मौसम गुमशुदा है!!
प्रकृति और प्रेम का गहरा रिश्ता है। जब मौसम बदलता है, तो मन की दशा भी बदलती है। प्रकृति पर लिखी कविताओं की श्रृंखला में यह रचना एक शाम की लालिमा और गुमशुदा मौसम की दास्तां बयां करती है।
आज मौसम गुमशुदा है!!
मैं सुर्खियां बटोरती हूँ शाम की बहार से,
तलाशती हूँ मैं सुकूँ अब लालिमा की धार से,
बेरंग काल अंत में जो रंग सिसकियां लिए,
बेईमान ओस है ढके अब धुंध के संवार से।।
कुछ शरारतें छिपी हुई हैं इस कदर।
की जान कर भी भूल जाती हूँ मैं सार से
और गर जान भी गयी तो क्या हुआ कोई गिला?
कहीं बैठ कर कभी तो कहो इस्तिरार से ~
तलाश काफिये की कभी की न हमने थी
पर हार गए आज हम मौसम की मार से।।
ख्याल में जिसे कभी आवारा जाना था,
मेरी कलम से उतरा है वो बे-बहार से ।।
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| "आज मौसम गुमशुदा है!!" — Finding solace in the changing moods of nature. |
(यह भी पढ़ें: धरती, ममता और मनुष्य का मध्यम मार्ग)
रश्मि की ये कविताएं इस बात का प्रमाण हैं कि युवा पीढ़ी की सोच में कितनी गहराई है। चाहे वह उदासी का दर्शन हो, क्रांतिकारी का यथार्थ, या मौसम की नज़ाकत—हर शब्द दिल को छूता है। यदि आप भी साहित्य प्रेमी हैं, तो ऐसी ही प्रेरणा लेते रहें और पढ़ते रहें।
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(युवा पाठकों के लिए सुझाव: Good Indian Books for Teenagers)
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
रश्मि सिंह कौन हैं?
रश्मि सिंह दिल्ली विश्वविद्यालय की एक छात्रा और उभरती हुई हिंदी लेखिका हैं, जो सामाजिक मुद्दों और मानवीय संवेदनाओं पर कविताएं लिखती हैं।
'उदासी ज़रा देर रहती है' कविता का मुख्य भाव क्या है?
यह कविता दर्शाती है कि खुशी जीवन में क्षणिक मेहमान की तरह आती है, जबकि उदासी और चिंतन की स्थिति मनुष्य के भीतर लंबे समय तक ठहरती है।
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