पृथ्वीराज रासो: पद्मावती समय (व्याख्या एवं भावार्थ)
Prithviraj Raso: Padmavati Roop Varnan & Analysis
हिंदी साहित्य का इतिहास शौर्य और सौंदर्य की गाथाओं से भरा पड़ा है। जब हम आदिकाल की चर्चा करते हैं, तो पृथ्वीराज रासो (Prithviraj Raso) का नाम सबसे पहले आता है। यह मात्र एक ऐतिहासिक दस्तावेज नहीं है, बल्कि सम्राट पृथ्वीराज चौहान और उनके मित्र चंदबरदाई की अमर मित्रता का प्रतीक है।
प्रस्तुत काव्यांश 'पद्मावती समय' से उद्धृत है। यहाँ कवि ने युद्ध के नगाड़ों को शांत कर, श्रृंगार की बाँसुरी छेड़ी है। यह वर्णन ठीक वैसा ही रोमांच पैदा करता है जैसा कि हमें सुभद्रा कुमारी चौहान की 'झाँसी की रानी' में वीर रस का अनुभव होता है, बस यहाँ भाव 'रति' (प्रेम) का है। साहित्यशाला के इस लेख में हम इसी अलौकिक सौंदर्य की व्याख्या करेंगे।
मूल पाठ (Original Text)
( छंद : कवित्त / छप्पय )
पद्मसेन कूँवर सुघर ताघर नारि सुजान।
ता उर इक पुत्री प्रकट, मनहुँ कला ससभान॥
मनहुँ कला ससभान कला सोलह सो बन्निय।
बाल वैस, ससि ता समीप अम्रित रस पिन्निय॥
बिगसि कमल-स्रिग, भ्रमर, बेनु, खंजन, म्रिग लुट्टिय।
हीर, कीर, अरु बिंब मोति, नष सिष अहि घुट्टिय॥
छप्पति गयंद हरि हंस गति, बिह बनाय संचै सँचिय।
पदमिनिय रूप पद्मावतिय, मनहुँ काम-कामिनि रचिय॥
कीर इक्क दिष्षिय नयन, तब मन भयो हुलास।
मन अति भयौ हुलास, बिगसि जनु कोक किरन-रबि॥
यह चाहत चष चकित, उह जु तक्किय झरंप्पि झर।
चंचु चहुट्टिय लोभ, लियो तब गहित अप्प कर॥
शब्दार्थ (Word Meanings)
- सुघर: सुंदर (Beautiful)
- ससभान (शशिभान): चंद्रमा (Moon)
- कीर: तोता (Parrot) - यह प्रतीक साहित्य में अक्सर प्रयुक्त होता है।
- बिंब: कुंदरू का लाल फल (अधरों की तुलना के लिए)
- काम-कामिनि: कामदेव की पत्नी 'रति'
- नष सिष: नख से शिख तक (पैर के नाखून से सिर तक का वर्णन)
व्याख्या एवं भावार्थ (Explanation & Analysis)
महाकवि चंदबरदाई वर्णन करते हैं कि समुद्र-शिखर (पद्मसेन) के घर एक सुयोग्य और सुंदर कन्या का जन्म हुआ। वह कन्या साक्षात चंद्रमा की कलाओं के समान थी। कवि उत्प्रेक्षा अलंकार का प्रयोग करते हुए कहते हैं कि ऐसा प्रतीत होता है मानो विधाता ने सोलह कलाओं से युक्त पूर्ण चंद्रमा को ही स्त्री रूप में गढ़ दिया हो।
1. सौंदर्य का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन:
रानी पद्मावती का रूप ऐसा है कि उनके अंगों को देखकर कमल, मृग, खंजन पक्षी और हंस भी लज्जित हो गए हैं। उनकी नाक तोते (कीर) की चोंच के समान सुंदर है और होंठ बिंब फल (लाल) के समान हैं। यह शैली हमें विद्यापति की पदावली के अर्थ-सौंदर्य की याद दिलाती है, जहाँ नायिका का रूप ही प्रधान है।
2. शुक (तोता) और भ्रम:
इस अंश का सबसे रोचक भाग वह है जब एक तोता (कीर) पद्मावती को देखता है। रानी के होंठ इतने लाल और सुंदर हैं कि तोते को भ्रम हो जाता है कि यह कोई 'बिंब फल' है। वह लोभवश चोंच मारता है, और रानी उसे पकड़ लेती हैं। यह प्रसंग पृथ्वीराज और पद्मावती के मिलन का सूत्रधार बनता है। भारतीय साहित्य में तोता अक्सर प्रेम का संदेशवाहक रहा है, चाहे वह रासो काव्य हो या बाद की सूफी परंपरा।
3. ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व:
पृथ्वीराज रासो केवल एक प्रेम कथा नहीं है। यह उस युग का दस्तावेज है जब भारत में क्षत्रिय धर्म और वचन का मान सर्वोपरि था। जैसे भीष्म प्रतिज्ञा में त्याग की पराकाष्ठा है, वैसे ही यहाँ प्रेम के लिए समर्पण है। यह काव्य पाठकों को उसी तरह प्रेरित करता है जैसे आज की "तू भी है राणा का वंशज" जैसी रचनाएँ युवाओं में जोश भरती हैं।
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निष्कर्ष (Conclusion)
चंदबरदाई का यह वर्णन सिद्ध करता है कि वे केवल तलवारों की झनकार के कवि नहीं थे, बल्कि कोमल भावनाओं के भी चितेरे थे। 'पद्मावती समय' हिंदी साहित्य की एक अनमोल धरोहर है। यह हमें सिखाता है कि वीर रस और श्रृंगार रस एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इस काव्य का अध्ययन न केवल परीक्षाओं के लिए, बल्कि भारतीय संस्कृति को समझने के लिए भी आवश्यक है।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
पृथ्वीराज रासो के रचयिता कौन हैं?
पृथ्वीराज रासो के रचयिता महाकवि चंदबरदाई हैं, जो पृथ्वीराज चौहान के राजकवि और सखा थे।
पद्मावती समय किस ग्रंथ का भाग है?
पद्मावती समय हिंदी के प्रथम महाकाव्य 'पृथ्वीराज रासो' का एक महत्वपूर्ण खंड (समय) है।
इस काव्य में कौन सा अलंकार प्रमुख है?
इस काव्यांश में उत्प्रेक्षा (मनहुँ कला ससभान) और अतिशयोक्ति अलंकार की प्रधानता है।