लेखिका: श्रीया राजपूत (Guest Post)
श्रीया राजपूत हिंदी साहित्य और सामाजिक विषयों पर लिखने वाली एक स्वतंत्र लेखिका हैं। साहित्यशाला पर आप उनकी अन्य चर्चित कविता "धरती, ममता और मनुष्य" (यहाँ क्लिक करें) भी पढ़ सकते हैं।
साहित्यशाला (Sahityashala) के मंच पर आज हम एक ऐसे रिश्ते की बात कर रहे हैं जो शब्दों से परे है। पिता का प्रेम अक्सर खामोश होता है, ठीक वैसे ही जैसे एक घना वृक्ष धूप सहकर भी दूसरों को शीतलता देता है। जिस तरह हम प्रकृति में उसकी ही छाँव तले आराम करने लगते हैं, ठीक वैसे ही एक पिता अपनी बेटी को जीवन की हर तपिश से बचाता है।
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| "एक पिता और बेटी का सफर: बचपन में उंगली पकड़ने से लेकर, सफलता की उड़ान और विदाई तक—हर मोड़ पर पिता का साया साथ रहता है।" |
श्रीया राजपूत का यह निबंध "बाप और बेटी" (Baap aur Beti) उसी निस्वार्थ प्रेम, त्याग और विदाई की पीड़ा का मार्मिक चित्रण है।
बाप और बेटी
बाप और बेटी का रिश्ता दुनिया के सबसे पवित्र और मज़बूत रिश्तों में से एक होता है। यह ऐसा रिश्ता है जिसमें बिना कहे भी एक-दूसरे की भावनाएँ समझ ली जाती हैं। सच कहा जाए तो दुनिया का सबसे कठिन काम एक बेटी का पिता होना होता है।
एक पिता अपनी बेटी को जन्म से ही सुरक्षा, संस्कार और स्नेह देता है। वह हर पल अपनी पुत्री की परछाईं बनकर उसके साथ रहता है। बेटी के जीवन की हर खुशी और हर चिंता में पिता उसकी ढाल बनकर खड़ा रहता है। अक्सर जीवन की उलझन से उम्मीद तक का सफर पिता की उंगली पकड़कर ही तय होता है।
पिता के जीवन का सबसे कठिन समय वह होता है, जब वह अपनी बेटी को विदा करता है। जिस बेटी का नाम उसने बचपन में उसकी किताबों पर बड़े प्यार से लिखा होता है, उसी बेटी का नाम एक दिन शादी के कार्ड पर लिखते हुए उसका दिल भर आता है। यह क्षण ठीक वैसा ही होता है जैसे किसी गहरी रात में तन्हा चाँद अपनी चांदनी को अलविदा कह रहा हो।
इस पूरे सफर में पिता अपनी बेटी के लिए चुपचाप हर जिम्मेदारी निभाता है। बचपन में उंगली पकड़कर चलना सिखाने वाला पिता, हर मोड़ पर उसे गिरने से बचाता है। वह उसे संस्कारों से सींचता है और उसकी पढ़ाई, खुशियाँ, सपने—हर जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठा लेता है। जब बेटियां घर छोड़ती हैं, तो मन में यही सवाल उठता है—क्या हम फिर वैसे ही लौट पाएंगे? (घर छोड़ने की पीड़ा)
बेटी को विदा करते समय पिता की आँखों में आँसू होते हैं, लेकिन चेहरे पर एक मुस्कान भी होती है, क्योंकि वह जानता है कि उसने अपनी बेटी को इतना सक्षम बनाया है कि वह समाज में उसका गौरव बनेगी। जैसे उसने अपने पिता का सम्मान बनाए रखा, वैसे ही आगे भी अपने पिता के गौरव को बनाए रखेगी। एक पिता के लिए उसकी बेटी की सफलता ही उसका सबसे बड़ा सम्मान है, ठीक वैसे ही जैसे एक सैनिक के लिए देशभक्ति और तिरंगे का मान सर्वोपरि होता है।
निष्कर्ष:
बाप और बेटी का रिश्ता वास्तव में बहुत ही अनमोल होता है— प्रेम, त्याग और विश्वास से भरा हुआ।
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साहित्यशाला का संदेश
श्रीया राजपूत द्वारा लिखित यह निबंध केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि हर उस घर की कहानी है जहाँ एक पिता अपनी बेटी के लिए सपने देखता है। यह रिश्ता समय की धारा के साथ और भी गहरा होता जाता है। साहित्य और समाज में ऐसे ही गहरे चिंतन के लिए आप दिनकर जी की कालजयी रचना परशुराम की प्रतीक्षा का विश्लेषण भी पढ़ सकते हैं जो हमें संघर्ष और धैर्य सिखाती है।
जीवन के हर वसंत में, रिश्तों की मिठास बनी रहे, मानो जैसे वसंत आए। अगर आप भी साहित्य प्रेमी हैं और नज़ीर अकबराबादी जैसी क्लासिक शायरी का अर्थ समझना चाहते हैं, तो यहाँ क्लिक करें।
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यहाँ क्लिक करें (Publish With Us)अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
उत्तर: यह रिश्ता निस्वार्थ प्रेम, सुरक्षा और मूक संवाद पर आधारित होता है। पिता अपनी बेटी का पहला हीरो होता है और बेटी पिता की सबसे बड़ी भावनात्मक पूंजी होती है।
उत्तर: जिस बेटी को पिता ने बचपन से नाज़ों से पाला होता है, उसे किसी और को सौंपना (कन्यादान) एक पिता के लिए जीवन का सबसे बड़ा त्याग और भावुक क्षण होता है।
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