हिंदी ग़ज़ल की परंपरा में दर्द और तन्हाई का रिश्ता बहुत पुराना है। राजस्थान की रेतीली धरती से अक्सर ऐसे स्वर उठते हैं जो दिल की गहराई तक उतर जाते हैं। आज साहित्यशाला पर हम प्रस्तुत कर रहे हैं चौहटन, बाड़मेर (राजस्थान) के स्वतंत्र लेखक मुकेश कुमार की एक ताज़ा ग़ज़ल।
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| A visual depiction of the poet's solitude: staring at the moon while the world sleeps. |
इनकी रचना "गहरी रात में तन्हा चाँद" एक ऐसे प्रेमी की व्यथा है जिसका दिल अपनों की बेरुखी से वीरान हो चुका है। जिस तरह हर्ष नाथ झा की रचनाओं में विरह का सन्नाटा मुखर होता है, वैसे ही मुकेश जी के शब्दों में एक खामोश चीख सुनाई देती है। यह ग़ज़ल केवल शिकायत नहीं, बल्कि उस भरोसे के टूटने का दस्तावेज़ है जो हम अक्सर गलत लोगों पर कर बैठते हैं।
गहरी रात में तन्हा चाँद
मेरा दिल काफी समय से विरान पड़ा है,
किस तरह जगह बनाएगा जो आन पड़ा है।
जिसने मेरे लिए दिल में सदा खंजर रखा,
वो आज मुझ पर कैसे कुरबान पड़ा है।
मैं अपनों के लिए सबतन्न हाजिर क्यों,
जिनकी बदौलत मेरा दिल बेजान पड़ा है।
मेरे मित्र मज़र समय में खैरियत को आएंगे,
उन्हें नहीं पता ये बिखरा इसी दौरान पड़ा है।
जो मेरे संग दर-ब-दर चलने आ रहा है,
शायद उसे पता है क्यों यह हैरान पड़ा है।
जो आया है उसे अपने हाल कैसे सुनाऊँ,
उसे तो अपनी हसरतों का गुमान पड़ा है।
मुझे हसरत थी वो मेरे दुख तोलने आया है,
मगर क्या ही करता खंडित पैमान पड़ा है।
यह मुझसे ना पूछ रात भर जागने की वजह,
मुझ पर किसी जुल्फों का एहसान पड़ा है।
सुना है बिछड़े संगियों को खुदा मिलाता है,
दिल का दिल में सिर्फ यही अरमान पड़ा है।
साहित्यिक विवेचना: विरह और विश्वास का द्वंद्व
मुकेश कुमार की यह गज़ल मानवीय संवेदनाओं के उस नाजुक पहलू को छूती है जहाँ प्रेम और पीड़ा एक साथ चलते हैं। 'वैरान दिल' और 'खंडित पैमान' (टूटा हुआ तराजू) जैसे रूपक (metaphors) यह बताते हैं कि शायर के भीतर एक गहरा शून्य है। यह भाव-भूमि योगेंद्र त्रिपाठी के 'सृजन के सुख और विरह के दर्द' से मिलती-जुलती है, जहाँ रचनाकार अपनी ही तड़प को शब्दों में ढालकर मुक्त होता है।
जब शायर 'जुल्फों के एहसान' की बात करता है, तो वह उस मीठे दर्द को स्वीकार करता है जो अक्सर यादों के रूप में शेष रह जाता है। यह स्वीकारोक्ति रश्मि सिंह की कविताओं में वर्णित 'उदासी के मौसम' की तरह है—जो नश्वर है, फिर भी उसका प्रभाव गहरा है। यहाँ 'अपनों' से मिले घाव का ज़िक्र 'एक शिकार, इतने शिकारी' की उस विडंबना को उजागर करता है जहाँ रक्षक ही भक्षक बन जाते हैं।
गज़ल का अंत (मक़्ता) निराशा में डूबा नहीं है, बल्कि 'खुदा मिलाता है' के भरोसे पर टिका है। यह आशावाद भारतीय साहित्य की आत्मा है, जो हमें अमौसा के मेले की लोक-संस्कृति से लेकर धरती और ममता के शाश्वत संबंधों तक में देखने को मिलता है। मुकेश जी की यह रचना हमें याद दिलाती है कि अंधेरी रात के बाद ही उम्मीद का चाँद सबसे अधिक चमकता है।
निष्कर्ष
मुकेश कुमार की "गहरी रात में तन्हा चाँद" केवल शब्दों का जमावड़ा नहीं, बल्कि एहसासों की एक यात्रा है। यह हमें सिखाती है कि टूटे हुए दिल के बावजूद उम्मीद का दामन थामे रखना ही ज़िंदगी है। साहित्यशाला परिवार मुकेश जी के उज्ज्वल साहित्यिक भविष्य की कामना करता है।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
'गहरी रात में तन्हा चाँद' ग़ज़ल के रचयिता कौन हैं?
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