जब यादों का कारवां दिल की दहलीज़ पर अचानक दस्तक देता है, तो वक़्त ठहर सा जाता है।
उर्दू अदब के शहंशाह ख़ुमार बाराबंकवी की रचनाएँ रूह की गहराईयों को छूने के लिए जानी जाती हैं। उनकी यह कालजयी ग़ज़ल "वही फिर मुझे याद आने लगे हैं" विरह और वफ़ा का एक ऐसा आईना है, जिसमें हर टूटा दिल अपना अक्स देख सकता है। यह रचना आधुनिक उर्दू ग़ज़ल के शिल्प का बेहतरीन नमूना है।
|
| वही फिर मुझे याद आने लगे हैं - ख़ुमार बाराबंकवी |
ग़ज़ल: वही फिर मुझे याद आने लगे हैं (हिंदी)
जिन्हें भूलने में ज़माने लगे हैं
वो हैं पास और याद आने लगे हैं
मोहब्बत के होश अब ठिकाने लगे हैं
सुना है हमें वो भुलाने लगे हैं
तो क्या हम उन्हें याद आने लगे हैं
हटाए थे जो राह से दोस्तों की
वो पत्थर मिरे घर में आने लगे हैं
ये कहना था उन से मोहब्बत है मुझ को
ये कहने में मुझ को ज़माने लगे हैं
हवाएँ चलीं और न मौजें ही उट्ठीं
अब ऐसे भी तूफ़ान आने लगे हैं
क़यामत यक़ीनन क़रीब आ गई है
'ख़ुमार' अब तो मस्जिद में जाने लगे हैं
— ख़ुमार बाराबंकवी
Lyrics in Hinglish (Roman Script)
Jinhen bhoolne mein zamane lage hain
Wo hain paas aur yaad aane lage hain
Mohabbat ke hosh ab thikane lage hain
Suna hai humein wo bhulane lage hain
To kya hum unhein yaad aane lage hain
Hataaye the jo raah se doston ki
Wo patthar mire ghar mein aane lage hain
Ye kehna tha un se mohabbat hai mujh ko
Ye kehne mein mujh ko zamane lage hain
Hawayein chalein aur na maujein hi utthein
Ab aise bhi toofan aane lage hain
Qayamat yaqeenan qareeb aa gayi hai
'Khumar' ab to masjid mein jaane lage hain
गहन विश्लेषण और तशरीह (Meaning)
यादों का पुनरागमन: इस ग़ज़ल का मतला मानवीय मनोविज्ञान की उस परत को खोलता है जहाँ हम जिसे जितना भुलाने की कोशिश करते हैं, वह उतना ही शिद्दत से याद आता है। यह भाव हमें अहमद फ़राज़ की यादों के करीब ले जाता है।
भरोसे का टूटना: "वो पत्थर मिरे घर में आने लगे हैं" वाला शेर आज के दौर के रिश्तों की कड़वी सच्चाई है। जहाँ हम दूसरों के लिए रास्ते आसान करते हैं, वहीं से हमें चोट पहुँचती है। यह रंज अहमद सलमान की तड़प के समान है।
देर से किया गया इज़हार: अक्सर हम दिल की बात कहने में इतनी देर कर देते हैं कि वक़्त गुज़र जाता है। इब्न-ए-इंशा की 'इक बार कहो' की तरह यहाँ भी इज़हार की एक गहरी कसक छिपी है।
ख़ुमार साहब की लेखनी में इश्क़ की कभी न हारने वाली फितरत झलकती है। वे नज़ीर अकबराबादी की तरह आम ज़ुबान में रूहानी बात कहने के माहिर थे।
FAQ: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. इस ग़ज़ल का मुख्य संदेश क्या है?
यह ग़ज़ल यादों की शक्ति और जीवन में मिलने वाले अनपेक्षित धोखों को दर्शाती है।
2. क्या ख़ुमार बाराबंकवी की अन्य ग़ज़लें भी उपलब्ध हैं?
जी हाँ, आप उनकी प्रसिद्ध रचना 'इक पल में इक सदी का मज़ा' भी साहित्यशाला पर पढ़ सकते हैं।
निष्कर्ष (Outro)
ख़ुमार बाराबंकवी की यह ग़ज़ल हमारे दिल की दुखती रग पर मरहम लगाने का काम करती है। यह हमें सिखाती है कि यादें भले ही दर्द दें, लेकिन वे हमारे अस्तित्व का हिस्सा हैं। चाहे सफ़र में कितनी ही मुश्किलें क्यों न आएं, साहित्य का यह सफर जारी रहना चाहिए।
अधिक जानकारी के लिए आप विकिपीडिया या रेख़्ता पर जा सकते हैं।