नवाज़ देवबंदी (Nawaz Deobandi) की शायरी केवल लफ़्ज़ों का खेल नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं (Human Sensibilities) का एक ऐसा दस्तावेज़ है जो रूह को झिंझोड़ कर रख देता है। उनकी सबसे मक़बूल ग़ज़ल, "वो रुला कर हँस न पाया देर तक", एक ही वक़्त में व्यक्तिगत पीड़ा और सामाजिक विडंबनाओं (Social Ironies) को समेटे हुए है।
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| ग़ज़ल का वह मर्मस्पर्शी दृश्य: "भूके बच्चों की तसल्ली के लिए / माँ ने फिर पानी पकाया देर तक"। |
जहाँ एक तरफ इसमें इश्क़ की नाज़ुक मनोवैज्ञानिक परतें हैं, वहीं दूसरी तरफ 'पानी पकाने' जैसा बिम्ब (Image) गरीबी की भयावह तस्वीर खींचता है। यह सामाजिक कटाक्ष हिंदी साहित्य में व्यंग्य (Satire) की परंपरा को भी छूता है। यह ग़ज़ल उस ग़ज़ल की संरचना (Ghazal Structure) का बेहतरीन नमूना है जहाँ हर शेर एक मुकम्मल कहानी कहता है। आइये, इस शाहकार (Masterpiece) की गहराइयों में उतरते हैं और इसके हर मिसरे में छिपे दर्द, फलसफे और समाजशास्त्र को टटोलते हैं।
वो रुला कर हँस न पाया देर तक
नवाज़ देवबंदी
वो रुला कर हँस न पाया देर तक
जब मैं रो कर मुस्कुराया देर तक
भूलना चाहा कभी उस को अगर
और भी वो याद आया देर तक
ख़ुद-ब-ख़ुद बे-साख़्ता मैं हँस पड़ा
उस ने इस दर्जा रुलाया देर तक
भूके बच्चों की तसल्ली के लिए
माँ ने फिर पानी पकाया देर तक
गुनगुनाता जा रहा था इक फ़क़ीर
धूप रहती है न साया देर तक
कल अँधेरी रात में मेरी तरह
एक जुगनू जगमगाया देर तक
Wo Rula Kar Hans Na Paya Der Tak
NAWAZ DEOBANDI
Vo rulā kar hañs na paayā der tak
Jab maiñ ro kar muskurāyā der tak
Bhūlnā chāhā kabhī us ko agar
Aur bhī vo yaad aayā der tak
Ḳhud-ba-ḳhud be-sāḳhta maiñ hañs paḌā
Us ne is darja rulāyā der tak
Bhūke bachchoñ kī tasallī ke liye
Maañ ne phir paanī pakāyā der tak
Gungunātā jā rahā thā ik faqīr
Dhuup rahtī hai na saayā der tak
Kal añdherī raat meñ merī tarah
Ek jugnū jagmagāyā der tak
विस्तृत विश्लेषण और भावार्थ (Detailed Analysis)
1. मनोवैज्ञानिक जीत (Psychological Victory)
जब मैं रो कर मुस्कुराया देर तक
यह शेर Resilience (लचीलेपन) और Sadism (परपीड़क सुख) के बीच के द्वंद्व को दर्शाता है। मनोवैज्ञानिक रूप से, एक ज़ालिम (या भावनात्मक शोषक) को मज़ा तब आता है जब पीड़ित टूट जाता है। लेकिन जब पीड़ित आंसुओं के बीच मुस्कुरा देता है, तो ज़ालिम की जीत, हार में बदल जाती है। यह वैसा ही है जैसे अहमद सलमान की ग़ज़ल 'जो हम पे गुज़रे थे रंज सारे' में दर्द को स्वीकार करने की ताकत दिखाई देती है। यहाँ मुस्कुराहट दुख के खिलाफ विद्रोह का सबसे बड़ा हथियार बन जाती है।
2. यादों का विरोधाभास (The Irony of Memory)
और भी वो याद आया देर तक
मनोविज्ञान में इसे "Ironic Process Theory" कहा जाता है। हम जिस चीज़ को भूलने की जितनी कोशिश करते हैं, हमारा दिमाग उसे उतना ही ज़्यादा याद करता है। दिल के इस व्यापार में अक्सर नुकसान ही होता है, जैसा कि अनंत गुप्ता की रचना 'दिल के बाज़ार में खसारा' में दर्शाया गया है। यादों का यह सिलसिला अहमद फ़राज़ की 'अब उसकी याद रात दिन' जैसा ही जानलेवा और गहरा है।
3. पीड़ा की चरम सीमा (The Threshold of Pain)
उस ने इस दर्जा रुलाया देर तक
जब दर्द बर्दाश्त की हद से बाहर हो जाता है, तो इंसान का तंत्रिका तंत्र (Nervous System) टूट जाता है और प्रतिक्रिया उलट हो जाती है—जिसे Paradoxical Laughter (विरोधाभासी हँसी) कहते हैं। 'बे-साख़्ता' (Uncontrollably) हँसना यह बताता है कि अब रोने के लिए भी आंसू नहीं बचे हैं।
4. गरीबी का वीभत्स सत्य (The Brutal Reality of Poverty)
माँ ने फिर पानी पकाया देर तक
यह शेर आधुनिक उर्दू शायरी के सबसे मार्मिक शेरों में से एक है। यहाँ 'पानी पकाना' एक रूपक (Metaphor) है—उम्मीद का, जो झूठी है मगर ज़रूरी है। यह दृश्य हमें दुष्यंत कुमार की जनवादी कविताओं की याद दिलाता है, जहाँ गरीबी सिर्फ आंकड़ा नहीं, बल्कि एक जीती-जागती त्रासदी है।
माँ जानती है कि चूल्हे पर खाना नहीं है, लेकिन वह पानी खौलाकर बच्चों को यह भ्रम देती है कि "खाना बन रहा है", ताकि इसी इंतज़ार में वे सो जाएँ। यह शेर ग़ज़ल को निजी दुख से निकालकर सामूहिक अनुभव (Collective Experience) बना देता है। यह सामाजिक असमानता पर एक दुखती रग पर उंगली रखने जैसा है। ऐसी ही सामाजिक और आर्थिक विवशता को हमने 'एक शिकार इतने शिकारी' वाले लेख में भी देखा था।
5. जीवन की क्षणभंगुरता (Law of Impermanence)
धूप रहती है न साया देर तक
यह शेर जीवन के सबसे बड़े सत्य को बयां करता है—परिवर्तन। न दुख (धूप) हमेशा रहेगा, न सुख (साया)। यह फलसफा नज़ीर अकबराबादी की नज़्मों की याद दिलाता है जो अक्सर फकीरी और दुनिया की नश्वरता (Waqt ki nazaakat) पर बात करते थे।
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| एक संजीदा शायर (नवाज़ देवबंदी का प्रतीकात्मक रूप) अपनी रचना के हर्फ़ों में खोया हुआ। |
6. उम्मीद की किरण (Symbol of Hope)
एक जुगनू जगमगाया देर तक
जुगनू उस आंतरिक प्रकाश का प्रतीक है जो घोर अंधकार में भी खुद को जलाकर रोशनी करता है। यह शेर चेतना पारीक की आधुनिक कविताओं की तरह ही आत्म-संघर्ष और अस्तित्व (Existence) की लड़ाई को दर्शाता है।
तकनीकी विश्लेषण (Fanni Jayza)
| तकनीकी शब्द | विवरण |
|---|---|
| बहर (Meter) | रमल मुसम्मन महज़ूफ़ (Ramal Musamman Mahzoof) Fa-i-la-tun, Fa-i-la-tun, Fa-i-la-tun, Fa-i-lun |
| रदीफ़ (Refrain) | देर तक (Der Tak) - यह पुनरावृत्ति समय और पीड़ा की अवधि को रेखांकित करती है। |
| काफ़िया (Rhyme) | पाया, मुस्कुराया, आया, रुलाया, पकाया, साया। |
अगर आप ग़ज़ल की बहर और मीटर को गहराई से समझना चाहते हैं, तो हमारा यह लेख ज़रूर पढ़ें: ग़ज़ल का इतिहास और पिंगल शास्त्र गाइड।
निष्कर्ष (Conclusion)
नवाज़ देवबंदी साहब की यह ग़ज़ल 'सा psycho शायर' जैसी आधुनिक शैली से अलग, क्लासिकल दर्द और ठहराव लिए हुए है। चाहे वह 'जुगनू' बनकर अंधेरे से लड़ना हो, या 'पानी पकाकर' बच्चों को सुलाना—यह शायरी इंसान की उस जिजीविषा (Will to live) को सलाम करती है जो तमाम मुश्किलों के बावजूद हार नहीं मानती। यह ग़ज़ल सिर्फ सुनी नहीं जाती, यह रूह पर तारी (haunt) हो जाती है... देर तक।
Curated by Harsh Nath Jha
अधिक जानकारी के लिए आप रेख़्ता पर नवाज़ देवबंदी का प्रोफ़ाइल देख सकते हैं या कविता कोश पर उनकी अन्य रचनाएँ पढ़ सकते हैं।
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Watch & Listen (Video Gallery)
1. Nawaz Deobandi Reciting his Signature Ghazal (Must Watch)
2. A Soulful Recitation (Pure Poetry)
3. Jagjit Singh's Rendition
Frequently Asked Questions (FAQ)
Q: 'वो रुला कर हँस न पाया देर तक' ग़ज़ल के शायर कौन हैं?
A: इस प्रसिद्ध ग़ज़ल के रचयिता नवाज़ देवबंदी (Nawaz Deobandi) हैं। यह उनकी 'सिग्नेचर ग़ज़ल' मानी जाती है।
Q: 'माँ ने फिर पानी पकाया देर तक' का क्या अर्थ है?
A: यह शेर गरीबी की चरम सीमा को दर्शाता है। माँ भूखे बच्चों को तसल्ली देने के लिए खाली पानी उबालती रहती है ताकि बच्चों को लगे कि खाना बन रहा है और वे इंतज़ार में सो जाएँ।
Q: इस ग़ज़ल में कौन सी बहर का इस्तेमाल हुआ है?
A: यह ग़ज़ल 'रमल मुसम्मन महज़ूफ़' (Ramal Musamman Mahzoof) बहर में लिखी गई है।