बे-क़रारी सी बे-क़रारी है - John Elia
|| Urdu Ghazal | Sad Poetry In Hindi ||
साहित्यशाला में आपका हृदय से स्वागत है। उर्दू अदब के मशहूर और हरदिल अज़ीज़ शायर जौन एलिया की लेखनी से निकली एक बेहद मर्मस्पर्शी ग़ज़ल 'बे-क़रारी सी बे-क़रारी है' आज हम आपके लिए लेकर आए हैं। उर्दू शायरी में दर्द, इंतज़ार और कशमकश का जो अक्स मिर्ज़ा ग़ालिब की महान रचना 'आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक' में दिखाई देता है, जौन एलिया उसी विरह को एक अलग ही बेबाक दीवानगी और सीधेपन के साथ पेश करते हैं। आइए, वस्ल (मिलन) और फ़िराक़ (जुदाई) के जज़्बातों में डूबी इस बेहतरीन ग़ज़ल को पढ़ें।
बे-क़रारी सी बे-क़रारी है,
वस्ल है और फ़िराक़ तारी है |
जो गुज़ारी न जा सकी हमसे,
हम ने वो ज़िंदगी गुज़ारी है |
निघरे क्या हुए कि लोगों पर,
अपना साया भी अब तो भारी है |
बिन तुम्हारे कभी नहीं आई,
क्या मेरी नींद भी तुम्हारी है |
आप में कैसे आऊँ मैं तुझ बिन,
साँस जो चल रही है आरी है |
उस से कहियो कि दिल की गलियों में,
रात दिन तेरी इंतिज़ारी है |
हिज्र हो या विसाल हो कुछ हो,
हम हैं और उस की यादगारी है |
इक महक सम्त-ए-दिल से आई थी,
मैं ये समझा तेरी सवारी है |
हादसों का हिसाब है अपना,
वर्ना हर आन सब की बारी है |
ख़ुश रहे तू कि ज़िंदगी अपनी,
उम्र भर की उमीद-वारी है |
ग़ज़ल की तशरीह (Meaning & Depth)
इस ग़ज़ल में जौन एलिया ने विरह और प्रेम की उस गहरी मानसिक कश्मकश को उकेरा है, जहाँ इंसान न तो पूरी तरह मिलन के सुख में होता है और न ही पूरी तरह जुदाई के दुख में। 'वस्ल है और फ़िराक़ तारी है' जैसी पंक्तियाँ मन की उस दुविधा को दर्शाती हैं जब महबूब पास होकर भी मीलों दूर महसूस होता है। जहाँ एक तरफ कैफ़ी आज़मी की 'झुकी झुकी सी नज़र' में मोहब्बत की एक खामोश और शर्मीली नज़ाकत है, वहीं जौन के यहाँ यह इश्क़ बेबाक, दर्दभरा और बेचैन कर देने वाला है।
जौन कहते हैं कि उन्होंने वो कठिन ज़िंदगी जी है जो शायद किसी और से न जी जा सके। 'साँस जो चल रही है आरी है'—यह प्रतीक बताता है कि जुदाई में ली गई हर एक साँस किसी तेज़ हथियार की तरह सीने को चीरती है। यह ग़ज़ल सिर्फ शब्दों का ताना-बाना नहीं है, बल्कि एक सच्चे आशिक़ के दिल का सीधा हाल है।
हमें उम्मीद है कि जौन एलिया की यह ख़ूबसूरत ग़ज़ल और उसकी तशरीह सीधे आपके दिल तक पहुँची होगी। लेकिन साहित्य केवल जज़्बातों और इश्क़ तक सीमित नहीं रहता; यह समाज का आइना भी है।
जब आप जौन की रूमानी बेचैनी से निकलकर समाज की ज़मीनी और कड़वी हक़ीक़त समझना चाहें, तो अदम गोंडवी की 'तुम्हारी फ़ाइलों में गाँव का मौसम' की सच्चाई से रूबरू हों। और अगर सीने में क्रांति और हक़ की आवाज़ बुलंद करनी हो, तो फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की अमर रचना 'हम देखेंगे' ज़रूर पढ़ें।
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